मेरी यात्रा

भारत की ज्ञान की यात्रा

मेरी यात्रा - भारत की ज्ञान की यात्रा

हिंदू तिथि के अनुसार पर्व
चैत्र (मार्च - अप्रैल) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (भारतीय नववर्ष) : ​चैत्र शुक्ल प्रतिपदा हिंदू पंचांग के अनुसार नव संवत्सर (भारतीय नववर्ष) का पहला और अत्यंत पवित्र दिन है। धार्मिक और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर भगवान ब्रह्मा ने संपूर्ण सृष्टि की रचना आरंभ की थी और इसी दिन से 'विक्रम संवत' की शुरुआत भी मानी जाती है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इस पर्व को बड़े हर्षोल्लास और विविध रूपों में मनाया जाता है—महाराष्ट्र में इसे 'गुड़ी पड़वा', आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में 'उगादी' तथा कश्मीर में 'नवरेह' के रूप में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इसी तिथि से नौ दिनों तक चलने वाले 'चैत्र नवरात्र' का भी शुभारंभ होता है, जिसमें माँ दुर्गा के नौ रूपों की उपासना की जाती है। प्रकृति में नए पत्तों और फूलों के आगमन के साथ बसंत के इस समय में यह दिन नई शुरुआत, सकारात्मक ऊर्जा, आध्यात्मिक शुद्धि और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का पावन संदेश देता है।
वैशाख (अप्रैल - मई)
ज्येष्ठ (मई - जून)
आषाढ़ (जून - जुलाई) आषाढ़ शुक्ल द्वितीया
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया: ​आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली विश्वप्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा सनातन धर्म के सबसे भव्य, पावन और प्राचीन आध्यात्मिक उत्सवों में से एक है। इस दिव्य तिथि पर महाप्रभु जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने मुख्य गर्भगृह (श्री मंदिर) से बाहर निकलकर अपनी मौसी के घर 'गुंडिचा मंदिर' की नौ दिवसीय यात्रा पर प्रस्थान करते हैं। नीम की पवित्र लकड़ी से बने तीन विशाल और सुसज्जित रथों—नंदीघोष (भगवान जगन्नाथ), तालध्वज (भगवान बलभद्र) और दर्पदलन (देवी सुभद्रा)—को खींचने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुँचते हैं। मान्यता है कि रथ की रस्सियों को स्पर्श करने मात्र से जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। जाति, धर्म और वर्ग के सभी बंधनों से परे सामाजिक समरसता, अटूट भक्ति और अलौकिक श्रद्धा का प्रतीक यह महापर्व भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान है।
पूर्णिमा
आषाढ़ पूर्णिमा : ​आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाला गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व सनातन संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा, कृतज्ञता और आत्म-ज्ञान के प्रति समर्पण का प्रतीक है। महाभारत, वेदों और पुराणों के रचयिता व संपादक महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी की जयंती होने के कारण इसे 'व्यास पूर्णिमा' भी कहा जाता है। हिंदू, बौद्ध और जैन परंपराओं में इस दिन का विशेष आध्यात्मिक महत्व है; मान्यता है कि इसी पावन तिथि पर भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था। इस दिन शिष्य अपने गुरुओं का चरण-वंदन, पूजन और आशीर्वाद प्राप्त कर उनके द्वारा दिखाए गए ज्ञान, विवेक और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शकों के प्रति सम्मान और श्रद्धा अर्पित करने का यह पावन अवसर जीवन में संस्कारों और विद्या की महत्ता को रेखांकित करता है।
श्रावण / सावन (जुलाई - अगस्त)
भाद्रपद / भादो (अगस्त - सितंबर)
आश्विन / क्वार (Kwar) (सितंबर - अक्टूबर)
कार्तिक (अक्टूबर - नवंबर) कार्तिक मास की अमावस्या
कार्तिक मास की अमावस्या : ​कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला दीपावली (दिवाली) का पावन पर्व सनातन परंपरा का सबसे प्रमुख, भव्य और प्रकाशमय उत्सव है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी शुभ तिथि पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम चौदह वर्षों के वनवास और लंकापति रावण पर विजय के पश्चात अयोध्या लौटे थे, जिनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने संपूर्ण नगर को घी के दीपकों से जगमगा दिया था। साथ ही, इसी दिन समुद्र मंथन के दौरान धन और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी माँ लक्ष्मी का प्राकट्य भी माना जाता है, जिसके चलते शाम के समय धन-धान्य और समृद्धि की कामना के लिए देवी लक्ष्मी एवं विघ्नहर्ता भगवान गणेश का विशेष पूजन किया जाता है। अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय का प्रतीक यह दीपोत्सव मिट्टी के दीपों, रंग-बिरंगी रंगोलियों, मिष्ठानों और आपसी प्रेम-सौहार्द के साथ पूरे भारत व विश्व भर में बड़े उल्लास से मनाया जाता है।
मार्गशीर्ष / अगहन (नवंबर - दिसंबर)
पौष / पूस (दिसंबर - जनवरी)
माघ (जनवरी - फरवरी)
फाल्गुन (फरवरी - मार्च)

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